चौराहा घासमंडी मुन्नालाल की दुकान,
संकरी सी गली का दुमंजिला मकान।
लाल सा चबूतरा, बैठक का गेट,
छज्जे के नीचे झूलती नेम प्लेट।
कानून की किताबें फाइलों के ढेर,
कुर्सियों की कतार मुकदमों की हेरफेर।
चश्में के पीछे एक इकहरा सा व़कील,
आज भी है खींचता सच्चाई की लकीर।
सच सच सच झूठ झूठ झूठ,
पानी पानी पानी दूध दूध दूध।
बाप भी बेटा भी पति भी भाई भी,
पास भी दूर भी हँसी भी रूलाई भी।
हर समय जीवंत लम्बा सा रुम,
कड़ियोँ वाली छत टीवी की धुन।