चौराहा घासमंडी मुन्नालाल की दुकान,
संकरी सी गली का दुमंजिला मकान।
लाल सा चबूतरा,बैठक का गेट,
छज्जे के नीचे झूलती नेम प्लेट।
कानून की किताबें फाइलों के ढेर,
कुर्सियों की कतार मुकदमों की हेरफेर।
चश्में के पीछे एक इकहरा सा व़कील,
आज भी है खींचता सच्चाई की लकीर।
सच सच सच झूठ झूठ झूठ,
पानी पानी पानी दूध दूध दूध।
बाप भी बेटा भी पति भी भाई भी,
पास भी दूर भी हँसी भी रूलाई भी।
हर समय जीवंत लम्बा सा रुम,
कड़ियोँ वाली छत टीवी की धुन।
संग सटा बॉक्स रूम एक बड़ा सा संदूक,
जाली की वो अलमारी सहती सब कुछ मूक।
खूँटी पर झूलता चिठ्ठी वाला तार,
जाने कितना दर्द समेटे जाने कितना प्यार।
अल्मारी की कुंडी पर जाने कितने बरसों से,
लोहे की वो कील लटकती हमने देखी अरसों से।
छोटा सा आँगन लोहे का जाल,
धुली हुई रसोई में खड़ाऊँ डाल।
रोटी सेंकती माँ खाने के बर्तन,
और ज़रा सी बात पर हुड़दंग करते हम।
चीं चीं करती चिड़ियाँ इधर उधर फुदकतीं,
और तिनको के घोसलों में जिंदगी भरतीं।
थोड़े से चावल रोटी के टुकड़े,
फुर्र से उड़ जातीं चोंच में पकड़े।
कितने बचपन कितने यौवन इस घर की दहलीज़ से,